नोचते हैं

ये जो नोचते हैं

कलियों के फंख

फिर कैसे चमन में

बहार आएगी ।

आज किसी और की

बेटी थी कल

तेरी बेटी की

बारी आएगी

धर्म के नाम पर

धर्म की आड़ में

कब तक इंसानियत

शर्मशार होगी

तुम्हें शायद पता नहीं है

कांटे बोवोगे तो

कांटों की फ़सल होगी
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नारायण

नारायण
तू ईश्वर का वरदान है
तूही जीने का अरमान
तू धरती का विस्तार है
तू अंम्बर का आकार है
तुझ से ही तो है
पर्वतों की द्रडता तुझी से है
तूझ से ही तो है सागर का धेर्य
नदियों की गति भी तूझ से ही है
तू ही तो सदा रहती है गतिमान
तुझ से ही तो हवा लेती है प्रेरणा
तू साँसे है जग की
बूंदों ने बरसना तुझ से ही सिखा है
तू जो बरसती है प्रेम बन कर
तू उत्पति है संसार की
इस लिए धरा तेरा अनुसरण करती है
मिटटी उत्पति का सार समझती है
फिर सोच तू कहाँ कमजोर है
बेबस और लाचार है
तू ही स्रष्टि का आगाज है
तूझी से ही अंजाम है
है नारी तू ही नर और नारायण है